नमोशूद्रों की हड़ताल: जब 800,000 दलित डट कर खड़े रहे

लेखन अनीता दास .अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद गौतम

Original article in English can be found here

“नमोशूद्र स्ट्राइक”, शशि मेमरी द्वारा कलाचित्र, 2021

#दलित_इतिहास_माह में आज हम वर्तमान के बांग्लादेश के नमोशूद्रों को नमन करते हैं, जिन्होंने अपनी परिस्थितियों को सुधारने के लिए दलित एकता की शक्ति को संगठित करने और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इतिहास में लम्बे समय तक, नमोशूद्रों ने हिंदू और मसलमान दोनों की बहुसंख्यता वाले क्षेत्रों में अपनी जनजातीय पहचान बनाए रखी। कालांतर में, कई अन्य जनजातियों की तरह, उनका समुदाय भी ब्राह्मणीकरण से प्रभावित हुआ जिसने उन्हें जाति व्यवस्था के बाहर ला खड़ा किया और उन्हें उत्पीड़न का शिकार बनाया। अतः, आदिवासी जीवनशैली में निपुण होने के बावजूद — बारिश के मौसम में नाव खेना, जलमार्ग पार करना और मछली पकड़ना और सूखे मौसम में खेती करना- उत्पीड़क जाति के हिंदुओं और मुसलमानों द्वारा उन्हें “अछूत” माना जाता था।

1800 के दशक तक, कई नमोशूद्र इस दुर्व्यवहार से तंग आ चुके थे। वे यह अच्छी तरह से जानते थे कि उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बिना उनके क्षेत्र की अर्थव्यवस्था टिक नहीं सकती। 1873 में, उन्होंने बांग्लादेश के फरीदपुर जिले में, गरिमा के लिए लड़े गए सबसे बड़े दलित आंदोलन का आगाज़ किया।

इसकी शुरुआत तब हुई जब एक गाँव में, अच्छा धन कमाने में सफल रहने वाले एक नमोशूद्र, चोरोन सपाह ने एक भोज आयोजित करने का फैसला किया जिसमें ब्राह्मणों और कायस्थों सहित गाँव के सभी सदस्यों को आमंत्रित किया गया। दलित व्यक्ति के घर से भोजन के निमंत्रण पर उत्पीड़क जातियों के हिंदु आग बबूला हो गए। अपने इस कथित अपमान के विरोध में उन्होंने नमोशूद्र महिलाओं पर अपमानजनक टिप्पणी कसना शुरू कर दिया।

“ऐसे पुरुषों के साथ भोजन खाना जो अपनी महिलाओं को बाज़ार जाने देते हैं और जिनसे जेलों में मैला साफ़ कराया जा है? इसके बाद और क्या देखना होगा?!”

नमोशूद्रों को अपनी महिलाओं पर ऐसी टिप्पणियां और उनसे जबरन करवाये जाने वाले शोषणकारी कामों का अपमानजनक उल्लेख बहुत चुभा। उन्होंने अपने पूरे समुदाय की एक बैठक बुलाई और एक प्रस्ताव पारित किया — समुदाय के सभी सदस्य उत्पीड़क जाति के मालिकों के लिए मज़दूरी नहीं करेंगे। पूर्ण हड़ताल शुरू हुई।

स्थानीय अर्थव्यवस्था पर तुरंत प्रभाव दिखने लगा। नमोशूद्र जाति के सदस्य प्रबल जाति के जमींदारों के लिए खेत मज़दूरी करते थे। और जब उन्होंने हड़ताल की, तो फसलें बर्बाद होने लगीं। नावों का निर्माण, रखरखाव और संचालन भी नमोशूद्रों द्वारा ही किया जाता था। इलाके में परिवहन भी ठप्प पड़ गया। बिना माल की आवाजाही के व्यापार भी नहीं किया जा सकता था। बाजारों में नुकसान होने लगा। लोगों के पास खाने की सामग्री ख़त्म होने लगी।

फरीदपुर में नमोशूद्रों की हड़ताल की खबर सुनकर, पड़ोसी जिले जेसोर और बरिसल की सभी स्थानीय दलित जातियाँ भी हड़ताल में शामिल हो गईं। दलित कैदी भी हड़ताल पर चले गए, और उन्होंने वे सभी अशुद्ध कामों को करने से इनकार कर दिया जिनसे “ऊंची” जाति के कैदियों को छूट मिली हुई थी।

उनके इस सामूहिक संघर्ष के परिणामस्वरूप, कई जमींदार भुखमरी और कंगाली के कगार पर आ गए।

तीन जिलों के लगभग 800,000 दलितों की यह हड़ताल छह महीने तक जारी रही।

हताश जमींदारों ने स्थानीय ब्रिटिश जिलाधिकारियों से हस्तक्षेप की गुहार लगाई। और दलित श्रमिकों की यह हड़ताल तभी समाप्त हुई जब अंग्रेजों ने, जमींदारों की सहमति से, दलितों के साथ दुर्व्यवहार को रोकने और उसे दंडित करने के लिए आधिकारिक आदेश पारित किए।

1873 में, करीब एक लाख दलित मजदूरों की इस प्रभावशाली, संगठित और पूर्णतः अहिंसक हड़ताल की यह छोटी-सी, इतिहास के पन्नों में लगभग गुम हो चुकी कहानी, सामूहिक संघर्ष की ताकत का एक ऐतिहासिक और अविश्वसनीय उदाहरण है।

अनीता दास एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं जिनकी रुचि जाति और मुक्ति-परक आस्था परंपराओं में है।

Redefining the History of the Subcontinent through a Dalit lens. Participatory Community History Project

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